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आदिवासियों के भूमि अधिकार

वन अधिकार क़ानून में यह लिखा है कि वह ऐतिहासिक भूलों को ठीक करने के लिए बनाया गया है | इन विस्थापितों को वन अधिकार देना सही दिशा में एक ऐतिहासिक कदम होगा ...

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आदिवासियों के भूमि अधिकार

2004 के बाद छत्तीसगढ़ राज्य में जब माओवाद विरोधी सलवा जुडुम आंदोलन शुरू हुआ था उसके बाद हज़ारों आदिवासी अपना घर द्वार छोड़कर पड़ोसी राज्यों की ओर भागने को मज़बूर हुए थे | उस समय कितने हज़ार को भागना पड़ा था इसका सही आंकड़ा किसी के पास नहीं है पर हमारा अनुमान है कि ऐसे लगभग 5000 परिवार या 30 हज़ार लोग हैं जो आज भी आँध्रप्रदेश, ओड़िसा और तेलंगाना के जंगलों में रहते हैं |

ये लोग जहां रहते हैं उनको गाँव कहना तो मुश्किल है क्योंकि वहां गाँव में मिलने वाली सामान्य सुविधाएं लगभग नहीं हैं | वहां उन्होंने जंगल काटकर खेत बनाए हैं और उस पर खेती करते हैं | पर उन ज़मीनों पर उनका मालिकाना हक़ नहीं है और आए दिन जंगल विभाग और पुलिस के लोग उनको परेशान करते रहते हैं | मैं ऐसे कई विस्थापित बसेरों में गया हूँ जिनको वन और पुलिस अधिकारियों ने दर्जनों बार तोड़ा या जलाया पर ये विस्थापित थोड़े समय बाद वहीं फिर डेरा जमा लेते हैं | उनके लिए घर वापस जाना अभी भी संभव नहीं है |

विस्थापितों के लिए घर वापस जाना भी संभव नहीं

इनमें से अधिकतर के मूल गाँव छत्तीसगढ़ में सड़क से काफी अंदर हैं जहां पर नक्सलियों का प्रभाव अब भी काफी अधिक है | और आंध्र और तेलंगाना में छत्तीसगढ़ के इन आदिवासियों को आदिवासी नहीं माना जाता और वहां पर ज़मीने उन्होंने लगभग 2005 के बाद पकड़ी है इसलिए वे वन अधिकार के लिए वहां आवेदन भी नहीं कर सकते क्योंकि वन अधिकार नियम के अनुसार 13 दिसंबर 2015 आख़िरी तारीख है जिसके पहले के कब्जे के बारे में आवेदन किया जा सकता है |

पिछले साल नवम्बर में छत्तीसगढ़ में जब कांग्रेस की नई सरकार आई तो इन विस्थापितों में थोड़ी आशा जगी | दो साल पहले शुरू हुई नई शांति प्रक्रिया ने उन्हें सुझाव दिया कि एक साइकिल रैली की तरह राजधानी रायपुर चला जाए और नई सरकार से उनके पुनर्वास के बारे में सोचने के लिए अनुरोध किया जाए | 22 फरवरी से 2 मार्च तक चली शांति साइकिल यात्रा में 300 विस्थापित साथी 300 किलोमीटर साइकिल चलाकर राजधानी रायपुर आये और सरकार ने उन्हें लोकसभा चुनावों के बाद मदद करने का आश्वासन दिया |

साइकिल यात्रा के दौरान हुई चर्चाओं में यह समझ आया कि अधिकतर विस्थापित अपने मूल गाँव में वन अधिकार के पट्टे के लिए आवेदन नहीं करना चाहते क्योंकि उन्हें यह लगता है कि जंगल के अंदर के उन गाँवों में उनको अभी भी जान का खतरा है | पर जब उस दौरान उन्हें वन अधिकार में अदला-बदली के अधिकार के बारे में पता चला जिसके अनुसार यदि कोई वनवासी 2005 के पहले अपने कब्जे की भूमि से विस्थापित हुआ है तो सरकार उनको बदले में कहीं और ज़मीन देगी | विस्थापित साथी अधिकतर गोंडी भाषी हैं और वन अधिकार नियम का अब तक गोंडी भाषा में अनुवाद नहीं हुआ है | अधिकतर विस्थापित साथी अशिक्षित भी हैं |

पर इस समझ के बाद अब वे लगभग सभी वन अधिकार में अदला बदली की ज़मीन पर भूमि अधिकार के लिए आवेदन करना चाहते हैं | आदिवासी अपने अधिकतर काम अपने देवताओं की पूजा के बाद शुरू करते हैं जैसे बीज पंडुम या उत्सव के बाद वे बीज बोना शुरू करते हैं | नई फसल भी वे देवताओं को देने के बाद ही स्वयं उपभोग करना शुरू करते हैं | हर आदिवासी गाँव के ग्राम देवता भी होते हैं उनका भी उत्सव होता है जिसे पेन पंडुम कहते हैं |

पिछले 15 वर्षों में विस्थापित ग्रामों के देवताओं का कोई उत्सव नहीं

पिछले 15 वर्षों में इन विस्थापित ग्रामों के देवताओं का कोई सम्मिलित उत्सव नहीं हो पाया है | तो साइकिल यात्रा के बाद हुए बस्तर डायलॉग 3 में यह सुझाव आया कि क्यों नहीं हम सभी विस्थापित ग्रामों के देवताओं का एक पेन पंडुम करें और उसके बाद वन अधिकार का फार्म सरकार को देना शुरू करें | इस उत्सव में लोग ढोल मांदर भी लेकर आएंगे और रात रात भर चलने वाला सांस्कृतिक उत्सव भी होगा | विस्थापित ग्राम देवताओं का उत्सव आंध्र, तेलंगनाना, ओडिसा और छत्तीसगढ़ के बार्डर पर कोंटा में 12 और 13 जून को होना तय हुआ है जिसके बाद विस्थापित साथी सरकार को वन अधिकार के फ़ार्म देना शुरू करेंगे

वन अधिकार का फार्म भरने में काफी दिक्कते हैं क्योंकि अधिकतर विस्थापित साथियों के पास उनके छत्तीसगढ़ के गाँव में निवास करने का कोई प्रमाण नहीं है | इनमें से बहुतों के घर जला दिए गए थे और अधिकतर जल्दबाजी में किसी तरह जान बचाकर भागे थे | और दूसरी दिक्कत है कि आवेदन की प्रक्रिया के लिए जरूरी वे अपने मूल गाँव डरकर जाना नहीं चाहते | इसके लिए सरकार को उनके मूल गाँव के बाहर ही कोई विशेष व्यवस्था करनी होगी

अब देखना है कि सरकारें हमारे बीच के इन सबसे तकलीफ में रह रहे लोगों का कितना साथ देती है | अधिकतर विस्थापित साथी उसी ज़मीन पर वन अधिकार चाहते हैं जहां वे पिछले 15 सालों से रह रहे हैं चाहे वह आंध्रप्रदेश हो या तेलंगाना | इसके लिए केंद्र सरकार को पहल करनी होगी और सभी सम्बंधित राज्यों को उसमे अपेक्षित सहयोग करना होगा |

वन अधिकार क़ानून में यह लिखा है कि वह ऐतिहासिक भूलों को ठीक करने के लिए बनाया गया है | इन विस्थापितों को वन अधिकार देना सही दिशा में एक ऐतिहासिक कदम होगा

(यह लेख पहले पत्रिका में छपी थी। लेखक की लिखित अनुमति से इसकी प्रतिलिपि प्रस्तुत की गयी है।)